(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.95. अध्यायः 095
अश्वमेधपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
वैशम्पायनेन जनमेजयंप्रति नकुलस्य निजस्वरूपकथनपूर्वकं तस्य नकुलत्वप्राप्तिविमोक्षकारणाभिधानम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

नमेजय उवाच।

कोसौ नकुलरूपेण शिरसा काञ्चनेन वै।
प्राह मानुषवद्वाचमेतत्पृष्टो वदस्व मे॥ 14-95-1(95261)
वैशम्पायन उवाच। 14-95-2x(7933)
एतत्पूर्वं न पृष्टोऽहं न चास्माभिः प्रभाषितम्।
श्रूयतां नकुलो योसौ यथा वाक्तस्य मानुषी॥ 14-95-2(95262)
श्राद्धं संकल्पयामास जमदग्निः पुरा किल।
होमधेनुस्तमागाच्च स्वयमेव दुदोह ताम्॥ 14-95-3(95263)
तत्पयः स्थपयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ।
क्रोधो नकुलरूपेण पिठरं पर्यकर्षयत्॥ 14-95-4(95264)
जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्टं किं कुर्याद्विप्रिये कृते।
इति सञ्चिन्त्य दुर्मेधा धर्षयामास तत्पयः॥ 14-95-5(95265)
तमाज्ञाय मुनिः क्रोधं नैवास्य स चुकोप ह।
स तु क्रोधस्ततो राजन्ब्राह्मणीं मूर्तिमास्थितः॥ 14-95-6(95266)
जितोस्मीति भृगुश्रेष्ठ भृगवो ह्यतिरोषणाः।
लोके मिथ्याप्रवादोयं यत्त्वयाऽस्मि विनिर्जितः॥ 14-95-7(95267)
वशे स्थितोऽहं त्वय्यह्य क्षमावति महात्मनि।
बिभेमि तपसः साधो प्रसादं कुरु मे प्रभो॥ 14-95-8(95268)
जमदग्निरुवाच। 14-95-9x(7934)
साक्षाद्दृष्टोसि मे क्रध गच्छ त्वं विगतज्वरः।
न त्वयापकृतं मेऽद्य न च मे मन्युरस्ति वै॥ 14-95-9(95269)
यान्समुद्दिश्य संकल्पः पयसोस्य कृतो मया।
पितरस्ते महाभागास्तेभ्यो बुद्ध्यस्व गम्यताम्॥ 14-95-10(95270)
इत्युक्तो जातसंत्रासस्तत्रैवान्तरधीयत।
पितॄणामभिषङ्गाच्च नकुलत्वमुपागतः॥ 14-95-11(95271)
स तान्प्रसादयामास शापस्यान्तो भवेदिति।
तैश्चाप्युक्तः क्षिपन्धर्मं सापस्यान्तमवाप्स्यति॥ 14-95-12(95272)
तैश्चोक्तो यज्ञियान्देशान्धर्मारण्यं तथैव च।
जुगुप्समानो धावन्स तं यज्ञं समुपासदत्॥ 14-95-13(95273)
धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः।
मुक्तः सापात्ततः क्रोधो धर्मो ह्यासीद्युधिष्ठिरः॥ 14-95-14(95274)
एवमेतत्तदा वृत्तं यज्ञे तस्य महात्मनः।
पश्यतां चापि नस्तत्र नकुलोऽन्तर्हितस्तदा। ॥ 14-95-15(95275)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥ 95 ॥ समाप्तमनुगीतापर्व। -------

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-95-4 पिठरं पात्रं। तत्पयः पीतवानित्यर्थः। तच्च क्रोधस्वरूपेण पिठरं धर्म आविशदिति झ. पाठः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.